भूमि उपयोग अधिकारों में देरी और बढ़ती चोरी की घटनाओं से परियोजनाएँ अब भी प्रभावित
मुंबई (महाराष्ट्र),1 अगस्त: अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों और बेहतर पवन संसाधनों के कारण धाराशिव जिला महाराष्ट्र में हरित ऊर्जा का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। राज्य सरकार चाहती है कि भूमि उपयोग अधिकार हासिल करने में होने वाली देरी, स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाली बाधाएँ और स्वार्थी तत्वों के हस्तक्षेप के कारण नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की गति प्रभावित न हो। इसी उद्देश्य से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पिछले वर्ष राज्य विधानमंडल के मानसून सत्र के दौरान ‘ज़ीरो-टॉलरेंस’ नीति की घोषणा की थी। इस नीति के माध्यम से सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया था कि हरित ऊर्जा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में किसी भी प्रकार की अनावश्यक रुकावट या हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।
नीति लागू होने के एक वर्ष बाद प्रशासनिक स्तर पर कुछ बाधाएँ जरूर कम हुई हैं, लेकिन ‘राइट ऑफ यूज़’ से जुड़ी लगातार हो रही देरी अब इतनी गंभीर आर्थिक चुनौती बन गई है कि केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी को भी इस पर सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त करनी पड़ी है। भूमि उपयोग अधिकार मिलने में विलंब के कारण परियोजनाओं की लागत लगातार बढ़ रही है, वित्तपोषण का बोझ भारी होता जा रहा है और परियोजनाओं को पूरा होने में अपेक्षा से कहीं अधिक समय लग रहा है। इसका सीधा असर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के आर्थिक भविष्य पर पड़ रहा है।
हाल ही में एक प्रमुख आर्थिक दैनिक को दिए गए साक्षात्कार में केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने स्वीकार किया कि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों को अब भी भूमि के राइट ऑफ यूज़ प्राप्त करने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए केंद्र सरकार विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम कर रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हरित ऊर्जा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में स्थानीय नेताओं और राजनीतिक हितों से होने वाले अनावश्यक हस्तक्षेप पर रोक लगाना बेहद आवश्यक है, ताकि परियोजनाएँ समय पर पूरी हो सकें।
महाराष्ट्र ऊर्जा विकास अभिकरण (MEDA) के अनुसार, धाराशिव जिले में लगभग 253 पवन ऊर्जा परियोजनाएँ विभिन्न चरणों में विकसित की जा रही हैं। महाराष्ट्र में स्थापित और निर्माणाधीन पवन ऊर्जा क्षमता का लगभग आधा हिस्सा अकेले धाराशिव में है। ऐसे में इस जिले की परियोजनाएँ न केवल राज्य के लिए, बल्कि केंद्र सरकार के 2030 तक 100 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता हासिल करने के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
30 जून 2026 तक देश की कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 57.44 गीगावाट थी। ऐसे में 2030 के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए भारत को आने वाले वर्षों में औसतन हर वर्ष लगभग 11 गीगावाट नई पवन ऊर्जा क्षमता जोड़नी होगी। इसके विपरीत, वित्त वर्ष 2025-26 में केवल 6.05 गीगावाट क्षमता ही जोड़ी जा सकी, जो घोषित लक्ष्य और वास्तविक प्रगति के बीच मौजूद बड़े अंतर को दर्शाती है।
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि के राइट ऑफ यूज़ प्राप्त करने में होने वाली देरी और महंगे विद्युत उपकरणों की बढ़ती चोरी, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की रफ्तार धीमी होने के दो सबसे बड़े कारण हैं। कई मामलों में भूमि उपयोग अधिकार हासिल करने की प्रक्रिया स्थानीय राजनीतिक हस्तक्षेप या अन्य स्वार्थी समूहों के कारण बाधित हो जाती है। कई बार केवल कुछ भूमि मालिकों के विरोध से पूरी पवन ऊर्जा परियोजना महीनों तक अटक जाती है। इससे न केवल परियोजनाओं के पूरा होने में देरी होती है, बल्कि उनकी लागत बढ़ जाती है, निवेश का जोखिम भी बढ़ता है और परियोजनाओं की समग्र आर्थिक व्यवहार्यता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
इसके अलावा, तांबे की केबल, विद्युत उपकरण, कंट्रोल पैनल और अन्य महंगे उपकरणों की चोरी नवीकरणीय ऊर्जा कंपनियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है। पिछले कुछ वर्षों में धाराशिव जिले में निर्माणाधीन पवन ऊर्जा परियोजनाओं में चोरी और तोड़फोड़ की घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है। असामाजिक तत्व रात के अंधेरे का फायदा उठाकर परियोजना स्थलों को निशाना बना रहे हैं। जनवरी 2026 से अब तक 20 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के उपकरण चोरी होने या क्षतिग्रस्त होने का अनुमान है। इन घटनाओं के कारण परियोजनाओं के निर्माण कार्य और बिजली उत्पादन दोनों प्रभावित हुए हैं, जिससे कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। साथ ही, इन घटनाओं ने नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालाँकि, पुलिस ने कुछ मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार कर चोरी का सामान बरामद किया है, लेकिन अधिकांश मामलों में उसकी व्यावहारिक उपयोगिता लगभग समाप्त हो चुकी होती है। चुराए गए उपकरणों को अक्सर बेचने से पहले खोल दिया जाता है या पिघला दिया जाता है। तांबे की केबलों को आसानी से ले जाने के लिए छोटे-छोटे टुकड़ों में काट दिया जाता है, जिससे बरामद होने के बाद भी उनका दोबारा उपयोग संभव नहीं रह जाता। परिणामस्वरूप, नवीकरणीय ऊर्जा कंपनियाँ अपना वास्तविक नुकसान नहीं भर पातीं, क्योंकि बरामद उपकरणों को न तो पहले जैसी स्थिति में बहाल किया जा सकता है और न ही उन्हें फिर से परियोजनाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है।
कानून-व्यवस्था बनाए रखना और राइट ऑफ यूज़ की प्रक्रिया समय पर पूरी कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा घोषित ‘ज़ीरो-टॉलरेंस’ नीति से कुछ प्रशासनिक बाधाएँ जरूर कम हुई हैं, लेकिन अब इस नीति को और अधिक प्रभावी तथा सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है। परियोजनाओं में बाधा डालने वाले स्वार्थी तत्वों पर अंकुश लगाना, भूमि उपयोग अधिकार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में तेजी लाना और परियोजनाओं की मूल्यवान परिसंपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना समय की मांग है।
यदि समय रहते ठोस और निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो परियोजनाओं में होने वाली देरी लागत को लगातार बढ़ाती रहेगी, उनकी आर्थिक व्यवहार्यता कमजोर होगी और महाराष्ट्र के साथ-साथ देश के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करना भी कठिन हो जाएगा।
